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04 February, 2015
26 June, 2014
*निबंध *
क्या भारतीय रेल को वित्तीय व्यवहार्यता के परिदृश्य में सामाजिक दायित्वों को नजरअंदाज करना चाहिए?
-पी.एन.कुमार
भारतीय रेल भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ है। हमारे माननीय रेल मंत्री का ध्येय इसे राष्ट्र की जीवन रेखा बनाने का है। हमारा लक्ष्य विश्व की नंबर एक परिवहन व्यवस्था बनने का है जिसे पूरा करने के लिए लाखों कर्मचारी एवं अधिकारी सतत प्रयत्नशील हैं।
चूँकि रेल एक स्वतंत्र निकाय है, अन्य निकायों की तरह इसे भी अपने संसाधनों के महत्तम उपयोग द्वारा गुणात्मक कार्य का संपादन करते हुए विकास करना है। विकास की प्रक्रिया को मूर्त्तरूप देने के लिए आर्थिक रूप से सबल होना आवश्यक है ताकि आधुनिकीकरण के अपने लक्ष्य को पूरा करने के साथ-साथ रेल अपने नेटवर्क का फैलाव जारी रख सके।
चूँकि रेल एक सार्वजनिक निकाय है, इसे अपने वित्तीय व्यवहार्यता के साथ-साथ अपने सामाजिक दायित्वों का भी निर्वहन करना है।
इस संदर्भ में हमारे माननीय रेल मंत्री द्वारा निम्न लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं-
1. भारतीय रेल को विश्व की नंबर एक परिवहन व्यवस्था बनाना।
2. रेल राजस्व में वृद्धि करना।
3. रेल राजस्व की क्षति को रोकना।
4. कर्मचारी कल्याण को प्रोत्साहित करना।
उपरोक्त लक्ष्यों की पूर्ति के लिए रेल को कुछ कड़े कदम भी उठाने पड़े हैं। इससे संदर्भित निर्देशों में इकोनॉमिक ड्राइव का निर्देश सर्वोपरि है। इकोनॉमिक ड्राइव रेल अनुरक्षण एवं संचालन में मितव्ययिता बरतने का निर्देश है। इसके मुताबिक रेल कर्मचारियों एवं अधिकारियों को कम लागत में बेहतर गुणात्मक परिणाम प्राप्त करने का निर्देश दिया जाता है। उदाहरण के रूप में निजी संस्थाओं का हवाला दिया जाता है क्योंकि रेल को भी लाखों कर्मचारियों के वेतन, भत्ते, पास, पेंशन, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, सुरक्षा के साथ उत्पादन एवं अनुरक्षण के भारी खर्चों को पूरा करते हुए लाभ कमाना है। कुछ हद तक तो यह ठीक है किंतु इकोनॉमिक ड्राइव को अस्त्र बनाकर अपने मिशन को पूरा करने के लिए रेलवे को अपने सामाजिक दायित्वों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
एक सार्वजनिक संस्था के रूप में वह एक निजी संस्था की तरह सिर्फ अधिक से अधिक लाभ कमाने को ही अपना लक्ष्य नहीं बना सकती क्योंकि ऐसा करने पर करोड़ों भारतीयों की जीवन रेखा बनने का उसका सपना धूमिल हो जाएगा।
रेल राजस्व में वृद्धि के लिए सबसे अहम है रेल को सस्ती, सुरक्षित, साफ एवं शीघ्र परिवहन के मानदंडों पर खरा उतरना। इसके साथ ही अपने नेटवर्क को उन क्षेत्रों तक फैलाना जो क्षेत्र अब तक रेल की पहुँच के बाहर है।
उपरोक्त मानदंडों पर खरा उतरने के लिए हमारे प्रयास निम्नवत हैं-
1. सस्ती व्यवस्था
इसके लिए हमारे माननीय रेल मंत्री ने यात्री भाड़े को वृद्धि से मुक्त रख कर एक तरह से जन-कल्याण को प्रोत्साहित करने का काम किया है। आज भी भारतीय रेल देश की सबसे सस्ती परिवहन व्यवस्था है। हमने सबसे सस्ती दरों पर विश्व के अन्य रेलों के मुकाबले अपेक्षाकृत बेहतर सुविधा संपन्न यानों के परिचालन में प्रसिद्धि पाई है।
2. रेल को सुरक्षित बनाने के लिए भी कई तकनीकी एवं व्यवस्थात्मक सुधार किए हैं। इनके परिणामस्वरूप रेल एक सुरक्षित सेवा के रूप में विकसित हो रही है।
3. साफ-सफाई को एक आंदोलन के रूप में चलाकर हमने यात्री सुविधाओं के प्रति अपनी वचनबद्धता को स्थापित किया है।
4. रेलवे को शीघ्रतम परिवहन व्यवस्था बनाने के लिए रेल संचालन में आने वाले अवरोधों एवं विलंबन के कारकों (Factors of detention) को विश्लेषित कर हमने उनके निराकरण के उपाय किए हैं जिससे तीव्र गति से परिचालन संभव हो पाया है। साथ ही विलंबन पर भी कुछ हद तक काबू पाने में सफलता मिली है। इस संदर्भ में डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर का उल्लेख आवश्यक है।
जहाँ तक नेटवर्क के फैलाव का प्रश्न है, इस दिशा में भी वर्तमान से लेकर पूर्ववर्ती मंत्रियों एवं रेल प्रशासन का दृष्टिकोण पूर्णतः स्पष्ट रहा है।
हम अपने नेटवर्क के फैलाव के लिए कटिबद्ध हैं। मीटरगेज का अमान-परिवर्तन, लाइनों का दोहरीकरण, यात्री सुविधा मदों से सुसज्जित यानों का उत्पादन, स्टेशनों पर यात्री सुविधाओं की उपलब्धता में वृद्धि की जो गति जारी है उससे भारतीय रेल को विश्व की नंबर एक परिवहन व्यवस्था बनने में काफी कम समय लगने की उम्मीद है।
अब प्रश्न है कि रेल की जो भी उपलब्धियाँ रही हैं, क्या वे काफी हैं और क्या रेल अपनी इन उपलब्धियों के लिए अपनी वित्तीय व्यवहार्यता के परिदृश्य में सामाजिक दायित्वों को नजरअंदाज करता आया है।
जाहिर है, उपलब्धियाँ बहुत हैं किंतु पर्याप्त नहीं। अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति भी रेल का रुख सकारात्मक रहा है किंतु पर्याप्त नहीं। इसका कारण रेल राजस्व में वृद्धि के प्रति हमारी होड़ एवं यथाशीघ्र विश्व की नंबर एक परिवहन व्यवस्था बनने की हमारी चाहत रही है।
हमने सुरक्षा एवं संरक्षा जैसे मुद्दों पर उतना ध्यान नहीं दिया है, उतना कुछ नहीं किया है, जितना किया जाना चाहिए। हजारों रेलवे पुलों के अधिक आयु होने को हम नजरअंदाज करते रहे, किंतु नये पुल बनाते रहे। दोहरीकरण एवं सौंदर्यीकरण को जिस रफ्तार से हमने लागू किया, उस रफ्तार से पिछड़े क्षेत्रों तक रेल को पहुँचाने में हम असपफल रहे।
स्टेशनों पर हमने आरक्षण के लिए कंप्यूटर अधिक लगाये किंतु उन्हें चलाने के लिए आदमी कम दिए, लिहाजा यात्रियों को लंबी कतारों में लगना पड़ा। आधुनिकीकरण आवश्यक था, हमने किया, कर रहे हैं लेकिन बहाली पर अंकुश लगाकर हमने बेरोजगारी को बढ़ाने में सहयोग किया। टिकटों के दाम हमने नहीं बढ़ाये लेकिन एक सामान्य यात्री को बाजार में 12 से 15 रुपये में उपलब्ध भोजन हमने 40 रुपये में उपलब्ध कराया।
बड़ी लाइन के एयर ब्रेक गाड़ियों के लिए अनुरक्षण में काम आने वाले मदों पर हमने समुचित ध्यान दिया किंतु मीटरगेज की गाड़ियों के स्टोर मदों पर पर्याप्त ध्यान देने में हमने कोताही बरती।
पदोन्नति के सिलसिले में, नीचे से पदोन्नति देकर ऊपरी पद तो भर दिए गए लेकिन खलासी, हेल्पर, सफाई वालों की कमी को पूरा करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया जिसके कारण कार्य संपादन की गुणवत्ता प्रभावित होती रही।
चोरी क्षति (Theft & Loss) पर अंकुश लगाने में भी हम उतने सफल नहीं रहे। इसके लिए सुरक्षा बलों की कमी का रोना रोया जाता रहा है। रेलों में बढ़ती आपराधिक घटनाओं, चोरी, लूटपाट, नशाखुरानी की कारगुजारियों एवं जी.आर.पी. की ज्यादतियों पर अंकुश लगाने में हम सफल नहीं कहे जा सकते।
कुछ खास जगहों को छोड़कर कर्मचारियों के बच्चों के लिए स्वास्थ्य एवं शिक्षा की सुविधा भी हम उस स्तर पर मुहैया नहीं करा पाए, जैसा रेल जैसी महत्वपूर्ण संस्था को कराना चाहिए। यह सब हमने पेट काटकर अमीर बनने वाली कहावत को चरितार्थ करने के लिए किया।
जिस देश की आधे से अधिक आबादी साधारण जीवनयापन भी कठिनाई से कर रही हो, वहाँ प्रत्येक एक्सप्रेस गाड़ी में कम-से-कम आधे अनारक्षित डिब्बे लगने चाहिए लेकिन हम चार-पाँच डब्बे ही लगाते रहे। लिहाजा अनारक्षित यानों में यात्रियों को परेशानी झेलते रहने को मजबूर होना पड़ा जबकि कई एक्सप्रेस गाड़ियों के शयनयान एवं वातानुकूलित डिब्बे प्रायः खाली ही दौड़ते रहे। इन गाड़ियों का यथोचित विश्लेषण कर समुचित कदम उठाने में हम पूर्णतः सफल नहीं रहे हैं। हाँ, जनसेवा तथा जनसाधरण जैसी कुछ अनारक्षित/एक्सप्रेस गाड़ियाँ हमने जरूर चलाई हैं, किंतु इतना ही पर्याप्त नहीं है।
गरीब रथ की अवधारणा के पीछे भी हमारी वित्तीय व्यवहार्यता का दृष्टिकोण ही रहा है। तेरह हजार करोड़ के लक्ष्य को पा सकने में हम पूर्णतः सक्षम हैं किंतु इसके साथ ही हमें एक अरब लोगों के लिए भी कुछ सोचना है।
हमें हमेशा इस बात का ध्यान रखना है कि हमारी प्रतियोगिता निजी परिवहन तंत्रों से कतई नहीं है। हमारे लक्ष्य/उद्देश्य व्यावसायिक नहीं है और न ही ऐसा करके हम देश की जीवन रेखा बनने के अपने सपने को पूर्णतः साकार कर पाएँगे।
कुछ क्षेत्रों को अगर छोड़ दें तो आज भी रेल जनजीवन की जीवन रेखा का ही दायित्व पूरा कर रही है। श्री महेंद्रनाथ चतुर्वेदी के शब्दों में- 'देश के व्यापार को बढ़ाने, समूचे देश में फैलाने, आपदाओं के समय सेवा कार्य करने,रोजगार के अवसर सुलभ कराने, पूरे देश में कल-कारखानों का विकास करने, देश भर में कीमतों को एक पैमाने पर रखने एवं गाँव व शहरों के विकास में अपना सहयोग करने में रेल ने अपना भरपूर सहयोग किया। शिक्षा का विस्तार हुआ, दूरियाँ मिट गईं, साहित्य, संगीत, लोकगीत, फिल्मों को भी रेल ने अछूता नहीं छोड़ा। इसप्रकार हमारे जन-जीवन की जीवन रेखा बन गई हमारी रेल।'
हमारे माननीय रेल मंत्री जी ने भी जन-साधरण, किसानों एवं व्यवसायियों के लिए कई कदम उठाने का आश्वासन दिया है, जिनमें कल-कारखाने से रहित क्षेत्रों में रेल कारखाने स्थापित करने, स्टेशनों पर कोल्ड स्टोरेज बनाने,कृषि उत्पादों की खरीद, पैकिंग एवं विपणन, आमलोगों के उपयोग में आने वाली वस्तुओं के मालभाड़े में वृद्धि न करने जैसे प्रयास शामिल हैं।
इसप्रकार हमारा प्रत्येक कदम राष्ट्रहित से ओत-प्रोत रहा है। हमारा प्रत्येक कदम राष्ट्र को नया जीवन, नई दिशा देने का एक सार्थक प्रयास रहा है ताकि रेल की गति देश की गति के रूप में स्थापित हो सके। सच्चे अर्थों में रेल देश का अभिमान है। इस संदर्भ में अपनी एक कविता 'रेल बने अभिामान देश का' (रेल रश्मि 2003 में प्रकाशित) की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-
दसों दिशाएँ नाप देश को एक सूत्र में बाँध रहा,
गंतव्य दिलाने की खातिर जो जंगल पर्वत लाँघ रहा,
यातायात का सुगम सुलभ बन, बना है जो वरदान देश का
वो रेल बने अभिमान देश का।
लाखों की रोजी रोटी भी कायम है जिसके दम पर,
कहीं कहीं तो सेवा करती लागत से भी कम पर,
घाटे का व्यापार उठाये, पर रखता जो मान देश का,
वो रेल बने अभिमान देश का।
इसप्रकार हमने हमेशा जनहित को ध्यान में रखकर ही अपने कदम बढ़ाये हैं और आज भी उसी अवधरणा पर कार्यशील हैं किंतु विश्व की नंबर एक परिवहन व्यवस्था बनने की दौड़ में सफलता पाने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने संसाधनों में अभिवृद्धि करें जो मजबूत अर्थतंत्र के बिना संभव नहीं है। लिहाजा हमें अपने विकासशील उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मालभाड़े एवं सवारी भाड़े को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पुनर्विश्लेषित करना होगा ताकि भारतीय जनजीवन की जीवन रेखा की संज्ञा से विभूषित होने के लिए कटिबद्ध भारतीय रेल जन आकांक्षाओं को बिना नुकसान पहुँचाये अपनी लक्ष्य सिद्धि में अग्रसर बनी रहे।
अभिप्राय यह है कि सामाजिक दायित्व एवं वित्तीय व्यवहार्यता को सिक्के के दोनों पटलों की तरह ध्यान में रखते हुए इनमें सामंजस्य बिठा कर आगे बढ़ना ही रेलतंत्र की सबसे बड़ी जिम्मेवारी है।
सी.से.ई./मंडुवाडीह
पूर्वोत्तर रेलवे, वाराणसी
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